Cp Sahu
सूरजपुर/ प्रेमनगर। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र प्रेमनगर में एक आदिवासी गर्भवती महिला और उसके गर्भस्थ शिशु की मौत के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्राम नवापारा कला के ग्वारी निवासी 30 वर्षीय अंशिया श्याम, पति प्यारे लाल श्याम, करीब छह माह की गर्भवती थीं। उनका मायका नवापारा कला के ग्वारी में है, जबकि ससुराल ग्राम सारस्ताल के थीहाई पारा में है। मृतिका अपने माइके में थी कि तभी 20 अगस्त की रात करीब 10 बजे अचानक अंशिया के पेट में दर्द शुरू हुआ। इसके बाद परिजनों ने वाहन की व्यवस्था कर उन्हें प्रेमनगर अस्पताल ले जाने का प्रयास किया। परिजनों का कहना है कि रात करीब 1 बजे अस्पताल पहुंचने से पहले ही प्रेमनगर के जंगल वाले रास्ते में अंशिया की मौत हो चुकी थी। गर्भस्थ शिशु को भी नहीं बचाया जा सका।
अंशिया श्याम का यह दूसरा बच्चा था। उनका करीब तीन वर्ष का एक बच्चा पहले से है। मां की मौत के बाद अब तीन वर्षीय मासूम के सिर से मां का साया उठ गया है, जबकि परिवार के सामने उसकी परवरिश की जिम्मेदारी भी खड़ी हो गई है।
गर्भावस्था में सोनोग्राफी तक नहीं हुई, निगरानी पर सवाल
परिजनों के अनुसार अंशिया की गर्भावस्था के दौरान सोनोग्राफी नहीं कराई गई थी। अब सवाल यह है कि करीब छह माह की गर्भावस्था के दौरान महिला की कितनी बार प्रसवपूर्व जांच हुई, उसका एएनसी पंजीयन हुआ था या नहीं, स्वास्थ्य विभाग के मैदानी अमले ने उसका फॉलोअप किया था या नहीं और गर्भावस्था को सामान्य या जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया था, यह जांच का विषय है।
यदि महिला की नियमित स्वास्थ्य निगरानी हो रही थी तो अचानक गंभीर स्थिति उत्पन्न होने के बाद उसे समय पर आपातकालीन चिकित्सा सुविधा क्यों नहीं मिल सकी? वहीं यदि नियमित जांच नहीं हुई थी तो ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्र में गर्भवती महिलाओं की निगरानी को लेकर स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
रात 10 बजे दर्द, करीब 1 बजे अस्पताल पहुंचने से पहले मौत
परिजनों के अनुसार रात करीब 10 बजे पेट दर्द शुरू होने के बाद महिला को अस्पताल ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था की गई। करीब 1 बजे प्रेमनगर अस्पताल पहुंचने की बात सामने आई है। परिजनों का दावा है कि रास्ते में जंगल क्षेत्र में ही अंशिया की मौत हो चुकी थी। इस पूरे घटनाक्रम में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि महिला को अस्पताल पहुंचने में कितना समय लगा, क्या 102 या 108 जैसी आपातकालीन स्वास्थ्य परिवहन सेवा से संपर्क किया गया था, यदि किया गया तो वाहन क्यों नहीं मिला और महिला की मौत का वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या था।
दोपहर 3 बजे हुआ पोस्टमार्टम, फिर शव के लिए भी वाहन नहीं
महिला की मौत के बाद पुलिस से संबंधित कागजी कार्रवाई की गई। इसके बाद 21 अगस्त को करीब दोपहर 3 बजे पोस्टमार्टम किया गया। परिजनों का कहना है कि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया सुबह भी हो सकती थी, लेकिन उन्हें दोपहर तक इंतजार करना पड़ा। पोस्टमार्टम के बाद असली परेशानी तब सामने आई, जब शव को घर ले जाने के लिए अस्पताल में वाहन उपलब्ध नहीं मिला।
परिजनों के अनुसार करीब एक घंटे तक वे शव ले जाने के लिए वाहन की तलाश करते रहे। अस्पताल की ओर से वाहन उपलब्ध होने की बात कही जाती रही, लेकिन मौके पर व्यवस्था नहीं हो सकी। आखिरकार परिजनों को स्वयं वाहन की व्यवस्था करनी पड़ी।
₹2,500 खर्च कर ट्रैक्टर से ले गए शव
परिजनों के मुताबिक ग्राम महोरा के उदय सरदार के पास से ट्रैक्टर मंगवाया गया, जिसके लिए करीब ₹2,500 खर्च करने पड़े। करीब 4 बजकर 10 मिनट पर शव को अस्पताल से बाहर ले जाया गया। इसके बाद शव को नवापारा कला के ग्वारी स्थित मायके ले जाया गया और फिर ससुराल ग्राम सारस्ताल के थीहाई पारा ले जाया गया, जहां अंतिम संस्कार किया गया।
एक ओर सरकार गरीब, ग्रामीण और आदिवासी परिवारों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने तथा जरूरतमंदों को परिवहन सुविधा देने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर एक मृत आदिवासी महिला का शव अस्पताल से घर तक पहुंचाने के लिए परिजनों को ₹2,500 खर्च कर ट्रैक्टर की व्यवस्था करनी पड़ी। यह स्थिति स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को सामने लाती है।
शासन की योजनाएं फिर किस काम की ?
गर्भवती महिलाओं की प्रसवपूर्व जांच, संस्थागत प्रसव और आपातकालीन परिवहन के लिए शासन द्वारा विभिन्न स्वास्थ्य योजनाएं एवं सेवाएं संचालित की जाती हैं। 102 और 108 जैसी आपातकालीन परिवहन सेवाओं का उद्देश्य भी जरूरत के समय मरीजों और गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य संस्थान तक पहुंचाना है। ऐसे में सवाल उठता है कि अंशिया श्याम जैसे ग्रामीण और आदिवासी परिवार को इन सुविधाओं का लाभ क्यों नहीं मिला?
यदि महिला अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत हो चुकी थी तो स्वास्थ्य विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी मौत की वास्तविक चिकित्सकीय वजह क्या थी। और यदि मौत से पहले आपातकालीन चिकित्सा की संभावना थी, तो समय पर उपचार और परिवहन की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकी?
मौत के बाद भी व्यवस्था की परीक्षा में स्वास्थ्य विभाग फेल?
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि मौत के बाद भी परिवार को व्यवस्था के लिए संघर्ष करना पड़ा। पोस्टमार्टम के बाद शव ले जाने के लिए करीब एक घंटे तक वाहन की तलाश और अंत में निजी तौर पर ट्रैक्टर की व्यवस्था यह सवाल खड़ा करती है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में शव परिवहन की व्यवस्था किसकी जिम्मेदारी है।
क्या अस्पताल में शव वाहन उपलब्ध था? यदि उपलब्ध था तो वह उस समय कहां था? यदि उपलब्ध नहीं था तो वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? क्या अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों को शासन द्वारा उपलब्ध किसी शव परिवहन सुविधा की जानकारी दी? इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना चाहिए।
जवाबदेही तय करने की मांग
इस पूरे मामले में केवल मौत का कारण जानना पर्याप्त नहीं होगा। गर्भावस्था के दौरान महिला की स्वास्थ्य निगरानी, एएनसी जांच, सोनोग्राफी, आपातकालीन परिवहन, अस्पताल पहुंचने का समय, मौत का चिकित्सकीय कारण, पोस्टमार्टम में हुई देरी और पोस्टमार्टम के बाद शव परिवहन की व्यवस्था इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक है।
स्वास्थ्य विभाग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि उस समय ड्यूटी पर कौन-कौन से अधिकारी और कर्मचारी मौजूद थे तथा शव परिवहन की जिम्मेदारी किसकी थी। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही, व्यवस्था की कमी या जिम्मेदारी से बचने की बात सामने आती है तो संबंधित अधिकारी-कर्मचारी की जवाबदेही तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
अंशिया श्याम की मौत और उसके गर्भस्थ बच्चे की मौत परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है, लेकिन यह घटना प्रेमनगर क्षेत्र की ग्रामीण एवं आदिवासी स्वास्थ्य व्यवस्था की भी गंभीर परीक्षा है। सवाल यह नहीं है कि मौत हो गई, सवाल यह है कि मौत से पहले और मौत के बाद शासन की स्वास्थ्य व्यवस्था ने इस परिवार के लिए क्या किया ?