- 127 शिक्षक लौटे, लेकिन 'पावर अटैचमेंट' पर चुप्पी क्यों?
- विधायक, सांसद और मंत्री कार्यालयों में संलग्न शिक्षकों को छूट किस आधार पर मिली?
- ट्राइबल विभाग, छात्रावास, कस्तूरबा विद्यालय और मंडल संयोजक पदों पर कार्यरत शिक्षकों को मूल विद्यालय कब भेजा जाएगा?
सूरजपुर। स्कूल शिक्षा विभाग के प्रदेश कार्यालय के निर्देश पर जिला शिक्षा अधिकारी सूरजपुर ने विभिन्न कार्यालयों में संलग्न 127 शिक्षक एवं लिपिकों का संलग्नीकरण समाप्त कर उन्हें मूल पदस्थापना पर भेज दिया है। हालांकि इस कार्रवाई के बाद आदेश के चयनात्मक पालन को लेकर विरोधाभास सामने आने लगे हैं, जिससे आम लोगों में नाराजगी और सवाल दोनों बढ़ रहे हैं।
गौरतलब है कि जिला शिक्षा अधिकारी सूरजपुर द्वारा 14 जुलाई 2026 को जारी आदेश क्रमांक 5968/स्था.-3/2026-27 के तहत 127 शिक्षक एवं लिपिकों को उनकी मूल पदस्थापना संस्था के लिए कार्यमुक्त कर दिया गया। यह कार्रवाई लोक शिक्षण संचालनालय, छत्तीसगढ़ के 25 जून 2026 के उस निर्देश के पालन में की गई है, जिसमें स्कूल शिक्षा मंत्री के निर्देशानुसार विभिन्न कार्यालयों में वर्षों से संलग्न कर्मचारियों एवं शिक्षकों को तत्काल उनके मूल विद्यालयों एवं कार्यालयों में वापस भेजने के आदेश दिए गए थे। शासन का उद्देश्य स्पष्ट था कि विद्यालयों में शिक्षकों की कमी दूर हो और शिक्षण व्यवस्था मजबूत बने, लेकिन सूरजपुर में जारी इस आदेश के बाद अब इसके निष्पक्ष क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
आरोप है कि एक ओर 127 शिक्षक एवं लिपिकों को मूल पदस्थापना में भेज दिया गया, वहीं दूसरी ओर जिले में वर्षों से विधायक, सांसद एवं मंत्री के निवास अथवा कार्यालयों में संलग्न शिक्षकों को यथावत रखा गया है। इतना ही नहीं, प्रेमनगर, रामानुजनगर सहित जिले के विभिन्न विकासखंडों में ट्राइबल विभाग के बालक-बालिका छात्रावासों, आश्रमों, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में अधीक्षक एवं अधीक्षिका का दायित्व संभाल रहे शिक्षक तथा ट्राइबल विभाग में मंडल संयोजक के रूप में कार्यरत कई शिक्षक भी अब तक अपने मूल विद्यालयों में नहीं भेजे गए हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि शासन का आदेश सभी प्रकार के संलग्नीकरण को समाप्त करने के लिए था, तो फिर कुछ शिक्षकों को इससे बाहर किस आधार पर रखा गया? क्या नियम केवल सामान्य शिक्षकों पर लागू होंगे और प्रभावशाली स्थानों पर वर्षों से जमे लोगों पर नहीं? यदि इन पदों पर शिक्षकों की सेवाएं वास्तव में आवश्यक हैं तो क्या इसके लिए शासन की अलग से स्वीकृति ली गई है और यदि ली गई है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
इस पूरे मामले को लेकर हमर उत्थान सेवा समिति ने जिला शिक्षा अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे शासन के निर्देशों की भावना के विपरीत बताया है। समिति का कहना है कि शासन के आदेश का पालन चयनात्मक नहीं बल्कि समान रूप से होना चाहिए। यदि विद्यालयों में शिक्षकों की कमी को दूर करना सरकार की प्राथमिकता है, तो विधायक, सांसद एवं मंत्री कार्यालयों, ट्राइबल विभाग के छात्रावासों, आश्रमों, कस्तूरबा विद्यालयों तथा मंडल संयोजक जैसे पदों पर वर्षों से संलग्न सभी शिक्षकों को भी तत्काल उनकी मूल पदस्थापना में भेजा जाना चाहिए। समिति ने यह भी मांग की है कि जिले में वर्तमान में विभिन्न विभागों एवं कार्यालयों में संलग्न सभी शिक्षकों की सूची सार्वजनिक की जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किसे किस आधार पर छूट दी गई है।
समिति ने चेतावनी दी है कि यदि शासन के आदेश का समान रूप से पालन नहीं किया गया और सभी संलग्न शिक्षकों को मूल पदस्थापना में वापस नहीं भेजा गया, तो उच्च अधिकारियों से शिकायत, तथ्यात्मक दस्तावेजों के साथ पत्राचार तथा सोशल मीडिया के माध्यम से इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाया जाएगा।